शुक्रवार, 9 नवंबर 2007

वापस नहीं जाऊंगा...

यादों के झरोखों में झांकने से डर लगता है
लोगों से खुलकर मिलने में डर लगता है,
इतना बदल दिया है वक्त के थपेड़ों ने
खुद से ही खुद को छिपाने का जी करता है,

सालों पहले जब निकला था घर से
दिल में अरमान थे हजारों,
जज्बा था जमाने को दिखाने का
सोचा था हम भी कुछ कर गुजरेंगे यारों,


लेकिन इस शहर की चकाचौंध में
न जाने कहां गुम हो गया मैं,
अपनों से तो दूर ही था
अपनेपन से भी दूर हो गया मैं,

जिनकी खातिर आया था इस अनजान शहर में
वो न जाने कहां छूट गए,
दौलत की इस दौड़ में
सारे सपने न जाने किस मोड़ पर छूट गए,

हर वक्त जगमगाने वाले इस शहर के
कायदे हैं कुछ अजीब से,
हर शख्स लगता है मतलबी
जब मिलता हूं करीब से,

जी करता है लौट जाऊं अपने शहर
जहां बसती हैं खुशियां हर चेहरे पर,
वो शहर जहां रहते हैं मेरे अपने
कुछ इस मोड़ पर तो कुछ उस मोड़ पर,

लौटने की क्या वजह बताऊंगा मैं
ये कहूंगा कि सब हैं वहां मतलबी,
वहां नहीं है कोई हमदर्द मेरा
नहीं है कद्र इंसान की,

कहीं ऐसा तो नहीं कि लोग कहने लगें
नाकाम होकर लौटा हूं मैं... कसने लगें मुझ पर ताने,
कहीं ऐसा न हो कि मेरे अपने ही
लगें मुझसे दूर जाने,

हर वक्त आंखों में तैरते इन सवालों का
क्या जवाब दे पाऊंगा मैं,
आखिर वापस लौटने की
क्या वजह बताऊंगा मैं,

रहने दो... वापस नहीं जाऊंगा मैं,
घर लौटकर नहीं जाऊंगा मैं....

बुधवार, 17 अक्टूबर 2007

भूख...

पढ़ा करता था अखबारों में
सुना करता था खबरों में
भूख से होती है मौत
भूख पेट की, भूख दो वक्त की रोटी की
सोचता रहता था कैसे मारती है भूख
बदहाल किसान मरते हैं भूख से
गरीब मरते हैं भूख से
अब भूख ने बदल लिया है मिजाज
बदल चुका है शिकार का उसका अंदाज
ये विदर्भ और बुंदेलखंड के किसानों की भूख नहीं है
ना ही ये उड़ीसा के कालाहांडी की भूख है
ये भूख है तरक्की का पैमाना लिखने वाले शहरों की
इसके निशाने पर कंक्रीट के जंगलों के जानवर
उनके पास सब कुछ है
लेकिन फिर भी नहीं खत्म होती इनकी भूख
उन्हें भूख है दौलत की
उन्हें प्यास है पैसे की
ऐसे ही लोगों की तलाश में निकल पड़ी भूख
आज नहीं तो कल करेगी उनका शिकार
होनी ही है उनकी मौत, आज नहीं तो कल
दौलत की भुखमरी से

बुधवार, 26 सितंबर 2007

दिल चाहता है...

दिल चाहता है...
बचपन की गलियों से एक बार फिर गुजरने को

मां की प्यार भरी गोद में बैठने को
बाबूजी की बाहों में झूला झूलने को

दादी की लोरी सुनकर सपनों में खोने को
बाबा के कंधे पर बैठकर पूरा गांव घूमने को

दिल चाहता है...
बचपन की गलियों से एक बार फिर गुजरने को

अमवा की डाली पर लटकने को
हवा में उड़ती पतंगें लूटने को
अंधियारी रात में तारे गिनने को
बारिश के पानी में जमकर छपकने को

दिल चाहता है...
बचपन की गलियों से एक बार फिर गुजरने को

गांव की पाठशाला में पटरी पर पढ़ने को
मास्टर जी की छड़ी से पिटने को
दोस्तों का खाना चुराकर खाने को
दिनभर धमाचौकड़ी मचाने को

दिल चाहता है...
बचपन की गलियों से एक बार फिर गुजरने को

क्या करे दिल ही तो है...

गुरुवार, 20 सितंबर 2007

खामोश आवाज़ें

खामोश आवाज़ें..

वक्त के कोरे पन्नों पर
कुछ आड़ी, कुछ तिरछी
लाइनें खींचता रहता हूं में

कितनी बातें हैं इस छोटे से मन मैं
बतलाने को जमाने को
खुद से ही कहता रहता हूं मैं

कितना आक्रोश है मुझ में
यूं लगता है गुस्से से बिखर जाउंगा
फिर भी सब कुछ सहता रहता हूं मैं

थम गई है जिंदगी की रफ्तार
सूझती नहीं है कोई सही राह
औरों दिखाने के लिए चलता रहता हूं मैं

शब्दों की बाजीगरी का खेल मुझे नहीं आता
अर्थ का अनर्थ करना मुझे कतई नहीं भाता
फिर भी न जाने क्यों लिखता रहता हूं मैं

जुबां से कहूं तो शायद कोई न समझे
शब्दों में बयां करता हूं दिल की बातें
क्योंकि यही हैं मेरी खामोश आवाज़ें