शुक्रवार, 9 नवंबर 2007

वापस नहीं जाऊंगा...

यादों के झरोखों में झांकने से डर लगता है
लोगों से खुलकर मिलने में डर लगता है,
इतना बदल दिया है वक्त के थपेड़ों ने
खुद से ही खुद को छिपाने का जी करता है,

सालों पहले जब निकला था घर से
दिल में अरमान थे हजारों,
जज्बा था जमाने को दिखाने का
सोचा था हम भी कुछ कर गुजरेंगे यारों,


लेकिन इस शहर की चकाचौंध में
न जाने कहां गुम हो गया मैं,
अपनों से तो दूर ही था
अपनेपन से भी दूर हो गया मैं,

जिनकी खातिर आया था इस अनजान शहर में
वो न जाने कहां छूट गए,
दौलत की इस दौड़ में
सारे सपने न जाने किस मोड़ पर छूट गए,

हर वक्त जगमगाने वाले इस शहर के
कायदे हैं कुछ अजीब से,
हर शख्स लगता है मतलबी
जब मिलता हूं करीब से,

जी करता है लौट जाऊं अपने शहर
जहां बसती हैं खुशियां हर चेहरे पर,
वो शहर जहां रहते हैं मेरे अपने
कुछ इस मोड़ पर तो कुछ उस मोड़ पर,

लौटने की क्या वजह बताऊंगा मैं
ये कहूंगा कि सब हैं वहां मतलबी,
वहां नहीं है कोई हमदर्द मेरा
नहीं है कद्र इंसान की,

कहीं ऐसा तो नहीं कि लोग कहने लगें
नाकाम होकर लौटा हूं मैं... कसने लगें मुझ पर ताने,
कहीं ऐसा न हो कि मेरे अपने ही
लगें मुझसे दूर जाने,

हर वक्त आंखों में तैरते इन सवालों का
क्या जवाब दे पाऊंगा मैं,
आखिर वापस लौटने की
क्या वजह बताऊंगा मैं,

रहने दो... वापस नहीं जाऊंगा मैं,
घर लौटकर नहीं जाऊंगा मैं....

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