बुधवार, 17 अक्टूबर 2007

भूख...

पढ़ा करता था अखबारों में
सुना करता था खबरों में
भूख से होती है मौत
भूख पेट की, भूख दो वक्त की रोटी की
सोचता रहता था कैसे मारती है भूख
बदहाल किसान मरते हैं भूख से
गरीब मरते हैं भूख से
अब भूख ने बदल लिया है मिजाज
बदल चुका है शिकार का उसका अंदाज
ये विदर्भ और बुंदेलखंड के किसानों की भूख नहीं है
ना ही ये उड़ीसा के कालाहांडी की भूख है
ये भूख है तरक्की का पैमाना लिखने वाले शहरों की
इसके निशाने पर कंक्रीट के जंगलों के जानवर
उनके पास सब कुछ है
लेकिन फिर भी नहीं खत्म होती इनकी भूख
उन्हें भूख है दौलत की
उन्हें प्यास है पैसे की
ऐसे ही लोगों की तलाश में निकल पड़ी भूख
आज नहीं तो कल करेगी उनका शिकार
होनी ही है उनकी मौत, आज नहीं तो कल
दौलत की भुखमरी से

कोई टिप्पणी नहीं: