दिल चाहता है...
बचपन की गलियों से एक बार फिर गुजरने को
मां की प्यार भरी गोद में बैठने को
बाबूजी की बाहों में झूला झूलने को
दादी की लोरी सुनकर सपनों में खोने को
बाबा के कंधे पर बैठकर पूरा गांव घूमने को
दिल चाहता है...
बचपन की गलियों से एक बार फिर गुजरने को
अमवा की डाली पर लटकने को
हवा में उड़ती पतंगें लूटने को
अंधियारी रात में तारे गिनने को
बारिश के पानी में जमकर छपकने को
दिल चाहता है...
बचपन की गलियों से एक बार फिर गुजरने को
गांव की पाठशाला में पटरी पर पढ़ने को
मास्टर जी की छड़ी से पिटने को
दोस्तों का खाना चुराकर खाने को
दिनभर धमाचौकड़ी मचाने को
दिल चाहता है...
बचपन की गलियों से एक बार फिर गुजरने को
क्या करे दिल ही तो है...
बुधवार, 26 सितंबर 2007
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