खामोश आवाज़ें..
वक्त के कोरे पन्नों पर
कुछ आड़ी, कुछ तिरछी
लाइनें खींचता रहता हूं में
कितनी बातें हैं इस छोटे से मन मैं
बतलाने को जमाने को
खुद से ही कहता रहता हूं मैं
कितना आक्रोश है मुझ में
यूं लगता है गुस्से से बिखर जाउंगा
फिर भी सब कुछ सहता रहता हूं मैं
थम गई है जिंदगी की रफ्तार
सूझती नहीं है कोई सही राह
औरों दिखाने के लिए चलता रहता हूं मैं
शब्दों की बाजीगरी का खेल मुझे नहीं आता
अर्थ का अनर्थ करना मुझे कतई नहीं भाता
फिर भी न जाने क्यों लिखता रहता हूं मैं
जुबां से कहूं तो शायद कोई न समझे
शब्दों में बयां करता हूं दिल की बातें
क्योंकि यही हैं मेरी खामोश आवाज़ें
गुरुवार, 20 सितंबर 2007
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